उस वक़्त, चार साल पहले भूली मानो सारी घटनाए इस वक़्त मेरे जहन में खून की तरह दौड़ने लगी। आज अचानक ही मेरा अतीत, मेरा भूतकाल, मेरा प्यार मेरी आंखों के सामने आ गया,

           मेने उसके दादु को सारी हकीकत बताई, की चार साल पहले हमारे साथ क्या हुवा था। ओर अभी इस एक साल में मेरे साथ क्या क्या हो गया वो सब कहा.. पर उसके दादु को मेरी इन बातो पर यकीन ही नही आ रहा था।
           उसके बाद दादु की अनुमति लेकर में निकल पड़ा अपने प्यार को ढूंढने..
           उसी झील के किनारे जहाँ उन लोगो ने हमे अलग किया था। वहाँ पहुचते ही मेने वहाँ की थमी हवाओ में जोर से संजु का नाम पुकारा,
           "संजु.. संजु.. देखो तुम्हारा वीरेंद्र तुमसे मिलने आया है.. संजु..."        
           ओर उसी के साथ शांत वातावरण एकदम हवामय हो गया.. चारो ओर से तेज़ हवाएं चलने लगी। मानो तूफान आने वाला हो.. ऊपर अशमान में चारो ओर अंधेरा छा गया। 
            में इधर उधर चारो ओर घूमकर.. अपनी संजु को ढूंढने लगा..
           "संजु.. संजु.. कहा हो तुम.."
           मेरी आवाज सुनते ही, प्रेत स्वरूप एक आत्मा के रूप में संजु मेरे सामने आ गई। 
           वही संजु.. जिसे मेने प्यार किया था। वही संजु जिसने मेरे पीछे अपनी जान दी थी। वही संजु जो पिछले चार सालो से मुझे पाने के लिए अपनी किस्मत से लड़ रही थी।          
         आज उसे अपने सामने देखकर में दौडकर उससे, उसकी रूह से लिपट गया। 
           उस वक़्त मानो एक इंसान ओर एक आत्मा का ये स्नेहमिलन भी अद्भुत था। 
          "संजु , तुम सिर्फ मेरी हो संजु.. आज में तुम्हे हमेशा के लिए अपनी बना लेना चाहता हु।"
            में जानता था की एक आत्मा ओर इंसान का मिलन कभीं मुमकिन नही। फिर भी.. में अपनी संजु के साथ रहेना चाहता था। जिंदगीभर रहेना चाहता था। वो एक आत्मा है इस बात से मुझे मानो कोई फरक ही नही पड़ता था। मेने तो बस प्यार किया था। ओर आज, अभी भी करता हु।  
         आखिर संजु ने मुजे, अपने प्यार को पा लिया यही शायद उसके प्यार की जीत थी। हमारी शादी तो हो गई थी बस आज की ये रात हमारी स्नेहमिलन की रात थी। 
         गाँव के बहार वही पुराने खण्डरों में, जहाँ हम अक्षर मिलते थे। उसने अपने होठ मेरे होठ पर रखे। उसके साथ पुष्पो की सेज पर गिरते ही, मेरे मोबाइल की रिंगटोन बजी..
         मेने देखा तो जानवी के पापा का कोल था, इतनी रात को विनय अंकल का कोल, आखिर बात क्या होगी। संजु के सामने मेने कोल उठाया,
         सामने से विनय अंकल की रोने की आवाज आई। 
           "वीर, बेटे जानवी.., जानवी ने जहर पी लिया। तुम जहां हो वहां से जल्दी से आ जावो।"
           "जानवी ने जहर पिया..? पर क्यो..?"
            "वो में नही जानता पर तुम वक़्त गवाए बिना जल्दी से आ जावों.. हम उसे दिल्ही अस्पतला ले जा रहे है। तुम सीधे वही आना।" 
            संजु को, वहाँ खण्डरों में अकेला छोड़कर फ़ौरन वहाँ से में भागा भागा दिल्ही पहुचा। 
                          * * *
           "अब वो खतरे से बहार है। आप जाकर मिल शकते है।"
            डॉक्टर के शब्द सुनकर मुझे थोड़ी राहत हुई। 
          हॉस्पिटल के उस कमरे में एक बेड पर वो आराम से सो रही थी। 
          पास बैठकर मेने उसका हाथ अपने हाथ में लिया.. उसने अपनी आंखे खोली, 
          बड़ी आवाज में उसे डांटते हुवे मेने कहा,
          "पागल हो गई हो.. मरने जा रही थी। तुम्हे कुछ हो जाता तो..?"
          मेरी आँखों मे उसके लिए इतनी परवाह देखकर उसकी आंखे मानो भर आई.. 
          मुझे उसी पल परेश के शब्द याद आये,
          "वो यहाँ तुम्हारे लिए आई है। वो नही चाहती की उसके अलावा तुम्हारी जिंदगी में कोई ओर लड़की आये शायद इसीलिए उसने जानवी पर दो बार हमला भी किया होगा.. मेरे ख्याल से तुम्हे जानवी से दूरी बनानी होगी.. अगर तुम जानवी के करीब रहोगे तो वो जानवी को मार देगी.."
          इसे पहले भी संजु जानवी पर दो बार वार कर चुकी है। ओर इस बार मेरे कारण जानवी को कुछ हो गया तो में अपने आप को कभी माफ नही कर पाऊंगा। 
          नही, मुझे जानवी से दूरी बनानी ही होगी.. जानवी का हाथ छोड़कर में वहॉ से जाने लगा की उसने मुझे रोकते हुवे मेरा हाथ पकड़ा
          "आई लव यु वीर.. में तुमसे बहोत प्यार करती हु.. में तुम्हारे बिना नही जी शकती प्लीज़.. वीर, मुझे यु तन्हा छोड़कर मत जावो.."
           उसके शब्दो ने मुझे रोक लिया, उसके पास
           उस वक़्त करू कुछ समझ में नही आ रहा था। अगर जानवी का प्यार एक्सपेट करू तो संजु उसे मार देगी, ओर अगर ना करू तो वो (जानवी) अपने आप को मार देगी
          हॉस्पिटल के कॉरिडोर में एक बेंच पर बैठा में अपने ही ख्यालो में खोया हुवा था की तभी मेरे सामने अचानक ही कॉरिडोर की सारी लाइट्से अपने आप ऑन ऑफ होने लगी। 
          मानो एक हवा का जोंका आया.. ओर उसीके साथ श्वेत से वस्त्रो में एक प्रेमात्मा स्वरूप वो मेरे सामने आई। 
          "वीरेंद्र, जानवी सच में तुमसे बहोत प्यार करती है। उसके प्यार को अपना लो। रही बात मेरी, तो में तो एक आत्मा हु ओर एक आत्मा ओर इंसान का मिलन इस जन्म में तो मुमकिन ही नही.. शायद अगले जन्म में हम फिर मिले.."
          ओर मेरे सामने एक प्यारी सी स्माइल देकर वो मानो उन हवाओं में कही ओझल हो गई। 
           उसके बाद मेने जानवी से शादी की, हमारी शादी में भी वो आई थी। मुझसे एक वचन लेने, की में जानवी को हमेशा खुश रखूंगा.. ओर उसे दिया वो वचन मेने उम्रभर निभाया, आज में जानवी के साथ बहुत खुश हु ओर हमे साथ देखकर वो.. प्यार का मतलब किसी को पा लेना ही नही होता। कभी कसी अपने की खुशी के लिए अपने प्यार को त्याग देना भी प्यार ही तो है। 
                      समाप्त
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