उसी दिन मेने उसे उसके गाँव अपने पापा के पास भेज दिया.. इसी दौरान यहाँ दिल्ही में, में ओर संजु दिल्ही की सड़को पर लेटनाइट घूमने फिरने लगे, काफे, थिएटर्स में घण्टो बैठकर प्यार की खूबसूरत पलो को काटने लगे। मुझसे मिलने कभी वो दिल्ही आती थी तो कभी उससे मिलने में लखनव चला जाता था। वैसे तो वो यहाँ लखनव में किसी के यहाँ कराए पर रहती थी। उसका घर तो लखनव से काफी दूर बसे एक छोटे से गाँव में था।
वक़्त के साथ हमदोनों एक दूसरे के काफी करीब आ गए।
जैसे ही मेरी बी.कॉम की पढ़ाई खतम हुई में अपने घर पहुच गया ओर पापा से संजु के बारे में बात की, पापा की तो हा ही थी, उसने कहा
"वीर, एकबार तुम लड़की के घरवालो से मिल लो, उन्हें अच्छे से जान लो फिर हम रिश्ते की बात आगे बढ़ाते है।" ये भी सही था।
संजु ने ही एकबार अपने गाँव में अपने घर का एड्रेस दिया था। उसने बोला था की कुछ दिन में अपने गाँव जा रही हु। इस वक़्त वो अपने गाँव में ही होगी सो उसे सरप्राइज देने के लिए में फ़ौरन उसके घर पहुच गया। लगा इस बार उसके साथ उसकी फेमेली से भी मिल लूंगा,
* * *
उसके गाँव पहुचकर में उसके घर का एड्रेस ढूंढने लगा। वही हाइवे की एक तरफ पनघट पर एक पीपल के पेड़ के नीचे कुछ नोजवान लड़के मोबाइल में पबजी खेल रहे थे। मेने उन लगो से ही एड्रेस पूछा,
"ये गजोधर वर्मा का घर किधर है..?"
उन नोजवानो में से एक ने बगल में पान की पिचकारी मारते हुवे कहा,
"इस बगलवाली गली में सीधे जाइए.. तीसरे नंबर का जो बड़ा घर आएगा वो उन्ही का है।"
उसने बताई हुई गली में सीधे जाकर में उस तीसरे नंबर वाले बड़े घर के बड़े दरवाजे के पास रुका,
मेने बहार से ही डोरबेल बजाई, बुजर्ग आदमी दरवाजा खोलते आंखों पर चश्में लगाए.. और सवालभरी निगाहों से वैसे ही मुझे घूरने लगा,
उनके सामने हाथ जोड़ते हुवे मेने कहा,
"नमस्कार अंकल, मेरा नाम है वीर, वीर सिंह रावत संजु ने मेरे बारे में आपको कुछ बताया होगा"
उसने मानो हैरानी से पूछा,
"कोन संजु..?"
"कोन संजु , अरे आपकी बेटी ओर कोन..?"
गुस्से में वो मुझे घूरने लगे, फिर पूछा,
"तुम उसे कैसे जानते हो..?"
"अरे अंकल में ओर संजु एकदूसरे से प्यार करते है। पिछले एक साल से हम लोग एकदूसरे से काफी टच में है। संजु ने ही मुझे बताया की वो छुटियां मनाने घर आई है। सो उसे ओर आप लोगो से मिलने में भी यहाँ आ गया.."
मेरी बात सुनकर इसबार वो एकदम से चोंक गए.. उसे मानो मेरी बातो पर यकीन ही नही हो रहा था।
"बस करो.. ओर कितना जुठ बोलोगे.." गुस्से में मुझे डांटते हुवे उसने दरवाजा बंध किया,
उन्हें रोकत्ते हुवे मेने कहा,
"अरे अंकल मेरी बात तो सुनिए.. में सच कह रहा हु.. आप एक काम केरो संजु से ही पूछ लो.."
मेने संजु को जोर से आवाज लगाई..
"संजु.. संजु जरा बहार आ तो.."
मुझे लगा मेरी आवाज सुनकर ही मानो वो दौड़ती हुई बहार आएगी पर नही.. वो नही आई..
उस अंकल ने गुस्से में अपनी बात रखते हुवे कहा,
"सुनो, तुम जिस संजु की बात कर रहे हो ना.. उसे मरे चार साल हो गए है। चार साल पहले ही उसने छत से लटककर आत्महत्या की थी।"
कैसे यकीन कर लु... संजु मर चुकी है...
"नही.. ऐसा कैसे हो शकता है.. अभी हाल में ही तो हम लगो मीले.."
ये बात सुनकर झटका लगा ना.. सच कहु तो मुझे भी झटका लगा.. जब उसके दादू के पास से सुना की उसे मरे हुवे चार साल हो गए है।
* * *
उसके दादू ने मुझे अंदर बुलाया, घर के मुख्य होल में सामने दीवार पर संजु की एक हार चढ़ाई हुई बड़ी सी तसवीर टंगी थी। उस तसवीर के पास जाकर मेने उस तसवीर में नजर आ रहे सुंदर चहरे को हाथ से छुवा.. की मानो मेरे आसपास कुछ पुरानी धुंधली धुंधली यादे एकदम से घूमने लगी.. अपना सिर पकड़ते हुवे में वही सोफे पर जा बैठा।
ठीक सामने बैठे उसके दादू ने मुझे पानी दिया, थोड़ा स्वस्थ होते ही उसने मुझसे कहा,
"संजु मेरी पोती है। में उसका दादाजी हु। आज से तकरीबन चार साल पहले वो वीरेंद्र नाम के एक लड़के से प्यार करती थी। वीरेंद्र ओर वो बचपन के दोस्त थे। दोनो साथ ही में पढ़ते थे। वक़्त के साथ उनकी दोस्ती कब प्यार में बदल गई किसीको भनक भी नही पड़ी।
दोनो अक्षर चोरी छुपे गाँव के बहार पुराने मंदिर के खण्डरों में मिलते थे। बाते करते थे, वादे करते थे। एक दूसरे में खोकर नई जिंदगी के नए सुनहरें ख्वाब सजातें थे।
पर एक दिन, संजु के पिता ने अपने एक विधुर दोस्त भैरव के साथ उसकी शादी तैय कर दी। संजु को ये शादी मंजूर नही थी तो उसने वीरेंद्र को खत लिखा, खत में लिखा की,
वीरेंद्र, मेरे पिताजी मेरी मर्जी के खिलाफ मेरी शादी कही ओर करा रहे है। में बस तुमसे से प्यार करती हु। अगर तुम भी मुजे सच में चाहते हो तो आवो ओर मुझे अपने साथ भगाकर ले जाओ। में तुम्हारे बिना नही जी शकती। अगर तुम नही आए तो मरने के अलावा मरे पास ओर कोई रास्ता ही नही बचेगा।
संजु का खत मिलते ही, समाज की परवाह किए बिना वीरेंद्र आया ओर अपनी संजु को मंडप से अपने साथ भगा ले गया।
उसके बाद एक ही हप्ते में भैरव ओर उसके आदमी लोग उन दोनो को शहर से उठा लाये। संजु की आंखों के सामने ही उसके वीरेंद्र को मारकर गाँव के बहार वाली गहरी झील में फेंक दिया।
उसके बाद फिर से संजु ओर भैरव की शादी तैय हुई.. पर शादीवाले दिन ही संजु ने छत से लटककर अपनी जान देदी।"
उसके दादु से मानो मेने अपना भुला हुवा सारा अतीत सुना, मेरे अतीत में भूली हुई एक एक कड़ी जुड़कर मानो मेरा अतीत मेरी आंखों के सामने आ गया।
में वीरेंद्र सिंह, संजु का प्यार.. में ही उस दिन मंडप में से अपनी संजु को अपने साथ शहर भगा ले गया था।
दिल्ही आकर, मेरे बेस्टफ्रेंड परेश की हाजरी में ही मेने ओर संजु ने कोर्ट मैरेज कर ली। ओर फिर उसीके एक खाली पड़े फ्लेट में हमदोनो पतिपत्नी की तरह रहने लगे। हमने मानो नया घर बसाया, अपना घर,
* * *
हमे दिल्ही आये, अभी एक ही हप्ता हुवा था की, एक शाम हमे ढूंढता हुवा भैरव अपने कुछ आदमियों के साथ वहाँ आ पहुचा, हम दोनो को खीचते हुवे जबरदस्ती जीप में बैठकर वो गाँव ले गया।
गाँव के बहार एक झील के किनारे मेरी संजु के आंखों के सामने उन लोगो ने मुझे मारकर उस गहरी झील में फेंक दिया।
पर मेरी साँसे अभी चल रही थी। में मरा नही था। में जीवीत था। जब होश में आया तब में दिल्ही की एक स्थानिक हॉस्पिटल में भर्ती था। मुझे वहाँ लानार का कहना था की, में उसे बहोत जख्मी हालात में गहरे पानी में से मिला।
उस वक़्त मेरे सिर पर काफी चोट आई थी। ओर उसी के कारण में अपनी पूरी यादास्त भूल चुका था। मुझे तो ये भी नही पता था की में कोन हु। ओर इस हॉस्पिटल में कैसे पहुचा..
हॉस्पिटल से बहार आते ही, वीरेंद्र वीर बन गया, उसी नाम से मानो मेने अपनी नई जिंदगी शुरू की। मेरा दोस्त परेश मकवाना मेरी लाइफ में वापस आया, उसकी के साथ मेने कॉलेज जॉइन की, जहाँ मेरी मुलाकात जानवी से हुई।
क्रमशः

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